Fatwa hakkında

özniteliği geçerli bir tarih olmalıdır. :

2015-05-22
Soru

मस्जिद नबवी में चालीस नमाज़ें पढ़ने की फज़ीलत के बारे में वर्णित हदीस ज़ईफ है

मैं ने सुना है कि जिसने मस्जिद नबवी में चालीस नमाज़ पढ़ी उसके लिए निफाक़ (पाखण्ड) से मुक्ति लिख दी जाती है। क्या यह हदीस सही है ॽ
Cevap
Cevap

हर प्रकार की प्रशंसा और गुणगान केवल अल्लाह के लिए योग्य है।

इस हदीस को इमाम अहमद (हदीस संख्या : 12173) ने अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु के माध्यम से नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम से रिवायत किया है कि आप ने फरमाया : “जिस व्यक्ति ने मेरी मस्जिद में चालीस नमाजे़ं इस प्रकार पढ़ीं कि उसकी कोई नमाज़ नहीं छूटी तो उसके लिए जहन्नम से बचाव (मुक्ति) और अज़ाब से मुक्ति लिख दी जाती है और वह निफाक़ (पाखण्ड) से बरी हो जाता है।”

किन्तु यह एक ज़ईफ हदीस है।

इसे शैख अल्बानी ने “अस-सिलसिला अस्सहीहा” (हदीस संख्या : 364) में उल्लेख किया है और उसे ज़ईफ कहा है। (अंत हुआ।) तथा उसे “ज़ईफुत् तर्गीब” (हदीस संख्या : 755) में उल्लेख किया है और उसे मुनकर कहा है। (अंत हुआ).

तथा अल्बानी ने अपनी किताब “हज्जतुन नबी सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम” (पृष्ठ : 185) में उल्लेख किया है कि मदीना नबविया की ज़ियारत की बिद्अतों में से “मदीना की ज़ियारत करने वालों का उसमें पाबंदी के साथ एक हफ्ता (सप्ताह) निवास करना है ताकि वे मस्जिद नबवी में चालीस नमाज़ें पढ़ सकें, ताकि उनके लिए निफाक़ से मुक्ति और नरक से बचाव लिख दिया जाए।” अंत हुआ।

तथा शैख इब्ने बाज़ ने फरमाया :

जहाँ तक लोगों के बीच प्रचलित इस बात का संबंध है कि ज़ियारत करने वाला आठ दिन निवास करेगा ताकि वह चालीस नमाज़ें पढ़ सके तो यद्यपि कुछ हदीसों में वर्णित है कि : “जिसने उसमें चालीस नमाज़ें पढ़ीं तो उसके लिए जहन्नम से मुक्ति और निफाक़ (पाखण्ड) से बचाव लिख दिया जाता है”, किंतु अन्वेषकों के निकट वह एक ज़ईफ (कमज़ोर) हदीस है जो प्रमाण नहीं बन सकती और न ही उस को आधार बनाया जा सकता है। तथा ज़ियारत की कोई निर्धारित सीमा नहीं है, यदि उसने एक घंटा या दो घंटा, या एक दिन या दो दिन, या इस से अधिक ज़ियारत की तो इसमें कोई आपत्ति की बात नहीं है।” संक्षेप के साथ अंत हुआ।

फतावा इब्ने बाज़ (17/406).

और इस ज़ईफ हदीस से एक हसन रिवायत बेनियाज़ कर देती है जिसे तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 241) ने जमाअत के साथ तकबीरतुल एहराम की पाबंदी की फज़ीलत में अनस बिन मालिक रज़ियल्लाहु अन्हु से रिवायत किया है कि उन्हों ने कहा : अल्लाह के पैगंबर सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम ने फरमाया : जिसने अल्लाह के लिए जमाअत के साथ चालीस दिन इस तरह नमाज़ पढ़ी कि उसकी पहली तकबीर (तकबीर तहरीमा) नहीं छूटती है तो उसके लिए दो मुक्तियाँ लिख दी जाती हैं : एक नरक से मुक्ति और दूतरी निफाक़ (पाखण्ड) से मुक्ति।” इसे अल्बानी ने सहीह तिर्मिज़ी (हदीस संख्या : 200) में हसन कहा है।

और इस हदीस से निष्कर्षित होने वाली फज़ीलत प्रत्येक मस्जिद में, किसी भी शहर (देश) में सर्वसामान्य है, वह मस्जिदुल हराम या मस्जिद नबवी के साथ विशिष्ट नहीं है।

इस आधार पर, जिसने चालीस दिन तक नमाज़ों की इस तरह पाबंदी की कि वह जमाअत के साथ तकबीरतुल एहराम को पा जाता था तो उसके लिए दो मुक्तियाँ लिख दी जायेंगीं ; जहन्नम से मुक्ति और निफाक़ से मुक्ति, चाहे वह मदीना की मस्जिद हो या मक्का की मस्जिद या इन दोनों के अलावा अन्य मस्जिदें हों।

और अल्लाह तआला ही सबसे अधिक ज्ञान रखता है।